शुक्रवार, 20 जनवरी 2017

MAHILAYE SAMAJ AUR PARIVAR [महिलायें समाज और परिवार]

पूरी दुनिया की 7 अरब 48 करोड़ आबादी में से आधी आबादी का प्रतिधिनिधित्व महिलाएँ करती हैं.किन्तु 193 देशों में महज ऊंगलियों पर गिनने लायक देश ऐसे हैं,जहाँ महिलायें पुरूषों के साथ समाज के अग्रिम पायदान पर हैं.बाकि के देशों में महिलायें किसी न किसी रूप में दोयम दर्जें की नागरिक ही समझी जाती हैं.महिलाओं के प्रति होनें वाले भेदभावों की अंतहीन सीमा हैं जैसें

लैंगिक भेदभाव [Sexual Discrimination]

विश्व के अधिकांश विकसित और विकासशील देश महिलाओं को लैंगिक समानता दिलानें में असफल साबित हुये हैं,कुछ महिलायें अपवाद बनकर जरूर आगें बढ़ी हैं,परन्तु उनकी आबादी के मान से यह संख्या उँट के मुहँ मे जीरे के समान हैं.स्त्रीयों को शारीरिक रूप से कमज़ोर मानकर उनको घरेलू कामो बर्तन,झाडू जैसे कामों तक सीमित रखना ,व्यापार  सुरक्षा जैसें घर के बाहरी कामों में पुरूषों का वर्चस्व होना.इसी प्रकार यदि  को बाहर पढ़ने - लिखने खेलकूद प्रतियोगिता में भाग लेनें जाना हो तो परिवार की रोक लड़कियों के लिये ही होती हैं.

मैं ऐसे ही एक परिवार को जानता हूँ,जिसकी होनहार बिटिया ने एम्स जैसे मेड़िकल कालेज की प्रवेश परीक्षा उत्तीर्ण कर ली परन्तु उसके परिवार ने उसे इसलिये रोक दिया की दिल्ली जैसे शहर में लड़की अकेली केसे रहेगी,इसके बनिस्बत उस परिवार ने उस लड़की का एड़मिशन अपने ही शहर के अपेक्षाकृत कमज़ोर रेंकिंग वाले मेडिकल कालेज में कराना उचित समझा.जबकि वही परिवार अपने लड़के को दूसरे प्रान्त में भेजकर IIT की शिक्षा दिलाना उचित समझता हैं.और नाते रिश्तेदारी में में बडे गर्व के साथ अपने बच्चें के बाहर रहकर पढ़ाई करनें की बात करता हैं. क्या इस सोच के साथ बेहतर समाज का निर्माण कर पायेंगे ? 

स्त्री और पुरूष समाजरूपी शरीर के हाथ और पांव हैं,इनमें से यदि शरीर में हाथ या पांव किसी एक का अभाव हो तो क्या हम शरीर को स्वस्थ मान सकते हैं.नही ना ! तो फिर समाज में एक का विकसित होना और दूसरें का अविकसित होना स्वस्थ समाज का निर्माण कैसें कर सकता हैं.

महिलाओं के प्रति भेदभाव मात्र यही तक सीमित नही हैं,बल्कि वे कामकाजी महिलाएँ जिनके परिवार ने उन्हें कामकाज की आजादी दी हैं से पूँछे तो हकीक़त और ज्यादा बेपर्दा होती हैं.

शारीरिक शोषण 


कार्यस्थल पर महिलाओं का शोषण आजकल आम बात हो गई हैं,जिसे सरकार हो या समाज कोई गंम्भीरतापूर्वक लेने के मूड़ मे नही हैं बल्कि यदि इस प्रकार की बातें जनसंचार माध्यमों में आ जाती हैं तो शक की ऊँगली महिला के नाते - रिशतेदारों और सहयोगीयों द्धारा पीड़ित महिला की ओर ही उठती हैं.

कार्यस्थलों,यात्रा के दोरान बसो,रेलगाडियों,भीड़भाड़ वाली जगहों पर पुरूषों द्धारा गलत नियत से महिलाओं को स्पर्श करना या स्पर्श करने का भरसक प्रयत्न करना ये सब वही पुरूष वर्ग करता हैं,जो किसी स्त्री का भाई,बेटा,पति या पिता हैं.

सरकारों द्धारा महिलाओं की सुरक्षा के नाम पर सैंकड़ो कानून,आयोग और संहिताएँ बनाई गयी हैं,क्या ये व्यवस्थाएँ स्त्रीयों से होनें वाली छेड़छाड़ को रोक पाई हैं ? नही ना ! क्योंकि कानून किसी समस्या का सम्पूर्ण समाधान नही हैं.
यदि महिलाओं के प्रति होनें वाली छेड़छाड़ को रोकना हैं, तो उस सोच को बदलना होगा उस समाज को बदलना होगा जहाँ यह सोच विकसित होती हैं. सोच कहाँ से विकसित होती हैं ? 
समाज कहाँ से बनता हैं ? 
निश्चित रूप से परिवार से सोच और समाज बनतें हैं.यदि हमनें परिवार मे ही लड़के - लड़की मे भेद का स्वांग रचा तो निश्चित है समाज में यही मानसिकता पलेगी बढेगी.

बलात्कार [Rape]


पूरी दुनिया में हर एक मिनिट में दस महिलाओं के साथ बलात्कार की घटनायें घट रही हैं,आखिर क्या वज़ह हैं,इन समस्याओं की ? कई लोग पुरूष वर्ग के समर्थन मे खडे होकर कहते हैं,कि स्त्रीयाँ ही कामुक वस्त्र पहनकर पुरूष को उत्तेजित करती हैं.मैं पूछना चाहता हूँ तो फिर दूधमुँही बच्ची के साथ बलात्कार क्यों होता हैं क्या वह बालिका भी बलात्कारी को उतनी ही कामुक लगती हैं.

वास्तव में बात फिर वही घूम फिरकर आती हैं,कि समाज की सोच ही निम्नस्तर की है.

मैंनें कई स्कूल - कालेजों के ड्रेसकोड़ की अनिवार्यता सम्बधी नियम - कानून  पढ़े-सुने हैं.जिसमें स्त्रीयों को सिर से पाँव तक ढँकने वाली ड्रेस पहनना अनिवार्य हैं.इस प्रकार की व्यवस्था पर समाज,कानून और अग्रिम पंक्ति के लोग क्यों खामोश रहकर मोन समर्थन देते हैं ? सवाल फिर वही आकर टीकता हैं,कि क्या कोई ड्रेस कामुक होती हैं ? अरे श्री मान आपकी सोच ही कामुक हैं.जो स्त्री ,बालिका में काम प्रवृत्ति खोजती हैं,जिसे तब तक नही ठीक किया जा सकता जब तक कि पारिवारिक मूल्यों को परिवर्तित नही कर दिया जाता इसके लिये प्रयास भी माता - पिता को लड़के - लड़कियों को समान स्वतंत्रता,समान सोच,देकर करनें होगें.

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