शनिवार, 30 अप्रैल 2016

Aids and society एड्स और समाज

एड्स और समाज


वैसे तो मनुष्य की उत्पत्ति के साथ ही बीमारियाँ मनुष्य के साथ पैदा हो गई थी,परन्तु मनुष्य  अपनी बुद्धिमता के दम पर इन बीमारीयों पर विजय प्राप्त करता रहा है,किन्तु विगत तीन दशकों से एड्स नामक बीमारीं लगातार मनुष्यों और समाज को प्रभावित कर रही हैं,आईयें जानतें हैं एड्स के विभिन्न प्रकार से मनुष्य और समाज पर पड़नें वालें प्रभावों के बारें में

मनोशारीरिक प्रभाव 

 एड्स एक मनोशारीरिक बीमारीं हैं,मनोशारीरिक इस रूप में कि एड्स (Aids) के 70  से 80 प्रतिशत मामलें "यौनजनित" होते हैं.ऐसे में एड्स पीड़ित व्यक्ति को समाज घृणा के दृष्टिकोण से देखता हैं,और इसका प्रभाव मनुष्य पर भी अनेक मनोशारीरिक बीमारीं जैसें मानसिक उन्माद,जीवन के प्रति निराशा आदि के रूप में पड़ता हैं.


सामाजिक प्रभाव


यदि एड्स को चिकित्सा जगत की चुनोतीं से बढ़कर "सामाजिक जगत" की चुनोतीं कहा जायें तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी एड्स (Aids) पीड़ित व्यक्ति का सामाजिक जीवन लगभग समाप्त हो जाता हैं.पड़ोसी बातचीत बन्द कर देतें हैं.यदि किसी परिवार में माता एड्स पीड़ित हैं और बच्चा एड्स से बचा हुआ हैं,तो भी उसका सामाजिक जीवन समाप्तप्राय हो जाता हैं. बच्चें की शिक्षा स्कूलों में नहीं हो पाती यदि किसी स्कूल (School) ने बच्चें को दाखिला   (Admission) दे भी दिया तो दूसरें बच्चें अपनें माँ बाप के दबाववश होकर उससे दूरी बना लेतें हैं.सोचियें क्या यह दृष्टिकोण किसी विकसित या अल्पविकसित राष्ट्रों की सामाजिक व्यवस्था के उचित विकास के दृष्टिकोण से आवश्यक हैं.



आर्थिक प्रभाव (Economical aspects)


एड्स "आर्थिक" दृष्टिकोण से भी एक राष्ट्र की "अर्थव्यवस्था" को नुकसान पहुँचाता हैं,एड्स पीड़ित अस्सी प्रतिशत व्यक्ति कामकाजी और घर के मुखिया  हैं ,ऐसी अवस्था में सम्पूर्ण परिवार गरीबी के दलदल में फँस जाता हैं.राष्ट्रों का अधिकांश बजट़ स्वास्थ क्षेत्र में व्यय हो जाता हैं.फलस्वरूप अनेक विकासात्मक ( Development) कार्यक्रम (programme) पीछें छूट जातें हैं.यदि विकासात्मक परियोजनाएँ पूरी करनें की ज़रूरत पड़ती हैं,तो वह दूसरें राष्ट्रों से कर्ज "Loan"लेकर ही पूरी हो पाती हैं.

हमें एड्स के प्रति सामाजिक दृष्टिकोण अत्यंत मानवीय बनाना होगा तभी हम इस बीमारीं से पीड़ित व्यक्ति के प्रति न्याय कर पायेंगें अन्यथा यह बीमारीं भी कुष्ठ ( Leprosy),पोलियों (Polio), की भाँति आनें वालें समय में चिकित्सा जगत के लियें चुनोतीं भले ही नहीं रहें परन्तु सम सामाजिक व्यवस्था को गंभीर चुनोतीं प्रस्तुत करेगी.क्या हम ऐसी सामाजिक व्यवस्था बनानें में कामयाब हो पायेेगें जिसमें दया,और करूणा मनुष्य की एकमात्र पहचान हो ?





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