बुधवार, 7 अक्तूबर 2015

ह्रदयाघात [ HEART ATTACK] पूर्व संकेत और प्राथमिक उपचार

#.सामान्य परिचय::-

सम्पूर्ण विश्व में तेजी से बदलतें सामाजिक, आर्थिक और तकनीकी (Technological) परिदृश्य ने ह्रदय रोगों को मनुष्य के शरीर में ह्रदय रोगों को मनुष्य शरीर में स्थाई निवास करनें का भरपूर अवसर प्रदान किया हैं.जिस प्रकार आज का मनुष्य सोशल मिड़िया के सामनें बेठकर २४ घंटों में से १५ से १६ घंटें बीता रहा हैं,उससे W.H.O.का यह दावा सही साबित हो सकता हैं,कि २०२० तक मरनें वाले लोगों में हर तीसरा व्यक्ति ह्रदय से संबधित रोगों वाला होगा.

ह्रदय मनुष्य शरीर का महत्वपूर्ण अंग हैं जो मनुष्य के जन्म से ही लगातार काम करता रहता हैं,और इसकी एक एक धड़कन मनुष्य के जीवित रहनें का प्रमाण हैं,ऐसे में यदि दिल बीमार हो जाता हैं तो मनुष्य का कर्तव्य बन जाता हैं,कि वह उसकी बीमारी को नज़रंदाज न करें.
Heart
 Heart
                       

#.ह्रदय से सम्बंधित बीमारीयाँ::-

१.उच्च रक्तचाप और निम्न रक्तचाप.
२.ह्रदय शूल (angina pectoris).
३.ह्रदय दोर्बल्य.
४.congestive heart fellure.
४.ह्रदय गति असामान्य रूप से बढ़ना.
५.शिराओं का फूलना.
६. ह्रदय की पेशियों की सिकुड़न.
७. जन्मजात ह्रदय से सम्बंधित रोग जैसे दिल में छेद होना.

#.आयुर्वैद मतानुसार ह्रदय रोग::-

१.वातज::-

अधिक शारिरीक व्यायाम,भूखे रहने पर,सदमा लगने पर,असंतुलित भोजन करनें से वायु प्रकुपित होकर ह्रदय प्रदेश में रोग उत्पन्न कर देती हैं.इन रोगों में में ह्रदय में खिंचावट़,ह्रदय में सुई चुभने जैसा लगना,angina pectoral,myocardial infection जैसे लछण प्रमुख हैं.

२.पित्तज::-

गर्म, कटु रस वाले द्रव्यों के सेवन से,शराब के सेवन से,क्रोध करनें से ह्रदय में पित्त का प्रकोप होकर पित्तज ह्रदय रोग हो जाता हैं.ह्रदय में जलन,मुँह में तीखा व अम्ल रस वाला पानी आना,चक्कर, बेहोशी आदि पित्तज ह्रदय रोग के चिन्ह होते हैं.

३.कफज़::-

कफवर्धक पदार्थों का अधिक सेवन,मेहनत का अभाव और अधिक आरामपरस्त होनें से कफज ह्रदय रोग होनें का खतरा रहता हैं.इनमें ह्रदय का शून्य सा होना,ह्रदय का जकड़ा सा लगना, मुँह का स्वाद मीठा सा लगना प्रमुख लछण होते हैं.

४.त्रिदोषज ::-

तीनों दोषों के अनुरूप ह्रदय रोग होनें से इसे त्रिदोषज ह्रदय रोग उत्पन्न होतें हैं.

५.कृमिज ह्रदय रोग::-

त्रिदोषज ह्रदय रोग की बड़ी हुई अवस्था ही कृमिज ह्रदय रोग होती हैं.इसमें ह्रदय में तीव्र पीड़ा,ह्रदय कम्पन आदि लछण प्रमुखता से उभरतें हैं.कभी कभी ह्रदय में विकृति भी आ जाती हैं,जिससे ह्रदय कपाट़ उचित रूप से बंद नहीं होतें हैं.



#.ह्रदयघात के पूर्व संकेत :::


१.ह्रदयाघात के पूर्व छाती में जकड़ाहट होती हैं,ह्रदय तीव्र दर्द करता हैं.

२.त्वचा चिचचिपी हो जाती हैं,और चेहरा पीला पड़ जाता हैं.ठंडा पसीना आता हैं.

३.थोड़ा सा चलनें पर या सीढ़ीया चढ़नें पर अत्यधिक थकान महसूस होती हैं.

४.बाँह,जबड़ें,में दर्द या पेट में बेचेनी 

५.कभी कभी ह्रदयघात से पूर्व व्यक्ति याददाश्त भी खो देता हैं,और बोलते समय शब्दों का गलत उच्चारण करता हैं.


#.उपचार::-

ह्रदय रोग चिकित्सा में आयुर्वैद अम्रत के समान लाभकारी हैं.यदि उचित चिकित्सा के साथ सम्यक जीवनशैली को अपनाया जावें तो रोगी शीघ्रतापूर्वक स्वस्थ होकर सामान्य जीवन जी सकता हैं.

१.अर्जुन छाल या अर्जुनारिष्ट़ का प्रयोग ह्रदय रोगों में सबसे आम व प्रमुखता से किया जाता है,इसके प्रयोग से कोलेस्ट्रोल नियत्रिंत होता हैं ,ह्रदय की धमनी मज़बूत बनती हैं और रक्तचाप नियत्रिंत होता हैं.

२.दशमूल क्वाथ का प्रयोग ह्रदय शूल(angina pector) में अद्भूत लाभ देता हैं.

३.आयुर्वैदिक ग्रीन टी का सेवन करनें से ह्रदय रोग होने की सम्भावना खत्म हो जाती हैं.

४.हल्दी का नियमित रूप से सेवन ह्रदय रोगी को करना चाहियें क्योंकि यह रक्त का थक्का नहीं बननें देती हैं.

५. जवाहरमोहरा पिष्टी का सेवन प्रवाल पिष्टी के साथ करनें से केसा भी ब्लाकेज हो खुल जाता है,और बायपास या एंजियोप्लास्टि की ज़रूरत नहीं पड़ती है.

६. योग की कुछ किृयाएँ ह्रदय रोग में अत्यधिक लाभकारी हैं जैसें प्राणायाम, कपालभाँति, अनुलोम-विलोम.

७.रेशायुक्त (fibre) खाद्य पदार्थ ह्रदय के लिये अत्यंत फायदेमंद होतें हैं,इनके सेवन से ह्रदय की धमनियों में जमा LDL कोलेस्ट्राँल का स्तर कम होता हैं,और ह्रदय मज़बूत बनता हैं.

८.शाकाहार सर्वोत्तम आहार हैं,इसका प्रमाण अब चिकित्सक देनें लगें हैं,यदि व्यक्ति मीट़,चिकन का सेवन करता हैं,तो इनमें उपस्थित उच्च कोलेस्ट्राल सीधा धमनियों में जाकर चिपकता हैं,जो अन्त में गंभीर ह्रदय रोग का खतरा उत्पन्न कर देता हैं,अत: ह्रदय रोग से बचना हैं,तो शाकाहारी भोजन आवश्यक हैं.

९.यदि किसी व्यक्ति का पारिवारिक इतिहास ह्रदय रोग का हैं,तो उसे तीस वर्ष की उम्र के बाद ह्रदय की नियमित जाँच करवाना शुरू कर देना चाहियें और एक संतुलित दिनचर्या और खानपान का कढ़ाई से पालन करना चाहियें.

१०.एक चिकित्सकीय शोध के अनुसार 7 घंटे की गहरी नींद से धमनियाँ अपनी पूरी क्षमता से कार्य करती हैं,अत: नियमित रूप से पर्याप्त मात्रा में रात को ली गई नींद ह्रदय रोग की संभावना कम करती हैं.

११.पानी प्राकृतिक स्वच्छक का कार्य करता अत: रोज दस से बारह गिलास पानी का सेवन ह्रदय की धमनियों में चिपका कोलेस्ट्राल शरीर से बाहर निकालकर ह्रदय को स्वस्थ बनाता हैं.

१२.तिल और अलसी के बीजों में फाइटोन्यूट्रीएंटस बहुतायत में पाये जातें हैं,जो भोजन में शामिल वसा का अवशोषण आंतो द्धारा कम करनें में मदद करतें हैं,अत: भोजन में समय समय पर अलसी और तिल का सेवन करते रहना चाहियें.

१३.देशी आम जिसमें छोटें - छोटें आम लगतें हैं,जिन्हें केरी कहा जाता हैं.के पत्तों में खराब कोलेस्ट्राल या LDL कम करनें की अद्भूत क्षमता होती हैं,यदि चार - पाँच पत्तें नियमित रूप से चबाकर खायें जायें तो ह्रदय रोग होनें की संभावना समाप्त की जा सकती हैं।

१४.नियमित रूप से 3 ग्राम दालचीनी का सेवन  करने से H D L कॉलेस्ट्राल या गुड कॉलेस्ट्राल का स्तर शरीर में  बढ़ता हैं । 

#.ह्रदयघात होनें पर प्राथमिक उपचार :::


कभी - कभी परिस्थितियाँ इस प्रकार की उपस्थित हो जाती हैं,कि राह चलते हुये व्यक्ति को ह्रदयघात (heart attack) आ जाता हैं,ऐसी परिस्थिति में व्यक्ति को प्राथमिक चिकित्सा का knowledge होना आवश्यक हैं.यह प्राथमिक चिकित्सा क्या हो आईयें जानतें हैं.

1.सबसे पहले रोगी यदि अचेतावस्था मे हैं,तो रोगी को बिना देर किये समतल ज़मीन पर शवासन की अवस्था में लिटा दें.

2.घुटनों के बल रोगी की छाती के पास बैंठ जायें.

3.दोनों हाथों को मिलाकर दोनों स्तनों के बीच में भरपूर ताकत के साथ दबाव डालकर छोड़े,यह क्रिया एक मिनिट में लगभग चालीस - पचास बार होनी चाहियें.

4.इस क्रिया को लगातार दस - पन्द्रह मिनिट तक या जब तक चिकित्सा उपलब्ध नही हो जाती करतें रहें.

5.यदि रोगी को होश में हो तो उसे जोर - जोर से खाँसने के लिये कहे या कंठ को हल्का दबाकर खाँसने मे मदद करें.

6.अनेक cardiologist का मानना हैं,कि उपरोक्त विधि द्धारा 100 में से 60 रोगी की जान बचायी जा सकती हैं.


कॉलेस्ट्राल क्या होता हैं :::


कॉलेस्ट्राल मनुष्य जीवन के लिये उपयोगी एक वसा (fat) हैं,जो मनुष्य की कोशिकाओं में पाया जाता हैं । इसका निर्माण लीवर में होता हैं । कोलेस्ट्राल की सहायता से ही मनुष्य शरीर विटामिन D और हार्मोन का निर्माण करता हैं ।

फ्रान्कैस द पुलितियर ने इसे कॉलेस्ट्राल के रूप में पहचाना जबकि  इसका नामकरण यूजीन चुरवेल नामक रसायन शास्त्री ने किया था ।


कॉलेस्ट्राल 4 प्रकार का होता हैं :::



1.L.D.L.कॉलेस्ट्राल :::


इसका पूरा नाम low density lipoprotien हैं । इसे बेड कॉलेस्ट्राल भी कहते हैं । शरीर में इस कोलेस्ट्राल की मात्रा 100 ml/gm dl से कम होना चाहियें । अधिक होने पर यह ह्रदय की धमनियों में रुकावट पैदा करता हैं जिससे ह्रदयघात का खतरा होता हैं ।

2.H.D.L.कॉलेस्ट्राल :::


इसका पूरा high density lipoprotien हैं । यह ह्रदय के लिये अच्छा माना जाता हैं । यह जितना अधिक होता हैं ह्रदय के लिये उतना अच्छा माना जाता हैं । यह कोलेस्ट्राल शरीर में 60 ml /gm dl के स्तर तक होना चाहियें ।


3.triglisraide :::



4.V.L.D.L. या very low density lipoprotien :::

यह कॉलेस्ट्राल  L.D.L.कॉलेस्ट्राल से भी बुरा माना जाता हैं । शरीर में इसकी अधिक मात्रा ह्रदयरोग का कारण बनती हैं ।


कॉलेस्ट्राल नापने को लिपिड प्रोफाइल टेस्ट कहा जाता हैं जिसमे  उपरोक्त चारों प्रकार के कॉलेस्ट्राल की जाँच की जाती हैं । एक अन्य विधि टोटल कॉलेस्ट्राल  नापने की हैं जिसमें एक साथ मिलाकर कॉलेस्ट्राल का स्तर शरीर में मापा जाता हैं । यह स्तर न्यूनतम 130 mg /gm dl और अधिकतम 200 mg / gm dl होना चाहियें ।








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