सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

GAJAR GHAS गाजर घास का उन्मूलन कैसे करें

खरपतवार
 गाजरघास
गाजर घास का वानस्पतिक नाम gajar ghas ka vansptik nam पार्थेनियम हिस्टेरोफोरस [ parthenium hysterophorus ] हैं.यह एस्टेरेसी कुल का सदस्य हैं.


इसके फूल सफेद रंग के होनें से इसे चटक चांदनी भी कहा जाता हैं.यह मूल रूप से अमेरिका और वेस्टइंडीज का पौधा हैं,जो पूरे विश्व में आयातित पदार्थों के माध्यम से विश्व में फैल गया.

भारत में यह पौधा लगभग 35 लाख हेक्टेयर में अनचाहे रूप से उगा हुआ हैं ।

मनुष्यों पर गाजर घास के हानिकारक प्रभाव 


गाजर घास के बहुत ही हानिकारक प्रभाव मानव स्वास्थ पर देखे गये हैं.इसमें घातक एलिलो रसायन जैसें एम्ब्रोसीन ,पार्थेनिन , कोरोनोपीलिन,फेरुलिक अम्ल,वेनिलीक अम्ल, कैफीन अम्ल ,पेरा - हाइड्राँक्सी बेन्जोइक अम्ल, तथा पेरा - काउमेरिक अम्ल पाये जातें हैं.ये घातक रसायन इसके सम्पर्क में आनें व्यक्ति वालें व्यक्तियों की त्वचा में खुजली ,एलर्जी , एक्जिमा जैसे घातक रोग पैदा करते हैं.

इसमें पाया जानें वाला पार्थेनिन मनुष्य की तंत्रिका     तंत्र को को प्रभावित कर डिमेंशिया,डिप्रेशन,अवसाद,सिरदर्द ,माइग्रेन जैसे रोग पैदा करता हैं.

गाजर घास के फूलो से निकलनें वाले परागकण श्वास के माध्यम से फेफडों में जाकर अस्थमा जैसे रोग पैदा करते हैं.

गाजर घास के बहुतायत क्षेत्रों के आसपास रहनें वालें व्यक्तियों को भूख की कमी ,आँखों से पानी आना,आँखों में खुजली होना जैसी समस्या पायी जाती हैं.

यदि गलती से इसकी पत्तियाँ मुहँ ,पेट में चली जाती हैं,तो मुहँ  और आंत में छाले  हो सकते हैं.

इसमें एक प्रकार का कैफीन अम्ल पाया जाता हैं,जो नींद नही आनें की समस्या पैदा कर सकता हैं.

गाजर घास प्रभावित जलसत्रोत का जल पीनें से डायरिया,पेचिस,और किड़नी से संबधित घातक रोग उभरतें हैं.

पशुओं के स्वास्थ पर प्रभाव


गाजर घास के विषेले प्रभाव से मनुष्य ही नही बल्कि पशु भी बहुत हानिकारक प्रभाव झेलतें हैं.यदि दुधारू पशु गाजर घास खा लेते हैं,तो उनके दूध का स्वाद कड़वा होकर मनुष्य के लिये बहुत हानिकारक हो जाता हैं,जिससे पेट संबधित बीमारी पनपती हैं.
गाजर घास के सेवन से पशुओं की जीभ पर छाले,आंतों पर छाले हो जातें हैं.


जैवविविधता पर प्रभाव 


गाजर घास को पर्यावरणविद "पारिस्थितिक आतंकवादी " कहते हैं,क्योंकि यह एलिलो रसायन उत्सर्जित कर अपने आसपास के पौधो की वृद्धि को रोक देता हैं.और स्वंय फलता फूलता रहता हैं. इस पौधे पर विपरीत मौसम का कोई विशेष प्रभाव नही पड़ता हैं.
गाजर घास के अत्यधिक फैलाव की वजह से पारम्परिक भारतीय जड़ी-बूटीयों का उन्मूलन हो रहा हैं.

गाजर घास का उन्मूलन


गाजर घास को नष्ट करना बड़ी महत्वपूर्ण चुनोतीं बन चुकी हैं,क्योंकि यह आसानी से नष्ट नहीं होता हैं,यदि पौधा 30 - 35 दिनों का हो गया तो यह अपना जीवनचक्र पूर्ण करता ही हैं.इसको नष्ट करनें की कुछ महत्वपूर्ण विधियाँ जानकारों द्धारा बताई गई जिसके अनुसार पौधे की शुरआती अवस्था में 2- 4 D नामक खरपतवारनाशी का छिड़काव इस पर कर देना चाहियें.

इसके अलावा एक अन्य विधि हैं,जिसमें गाजर घास को उखाड़कर गोबर के साथ सड़नें के लिये छोड़ दिया जाता हैं,व एक वर्ष पश्चात इस सड़ी हुई खाद का खेतो में प्रयोग किया जा सकता हैं.

इस सड़ी हुई खाद में नाइट्रोजन 2.5 %,फाँस्फोरस 1.38%,एँव पोटेशियम 1.29% प्रतिशत पाया जाता हैं,जो किसी भी फसल के लिये महत्वपूर्ण खाद हैं.

यदि गाजर घास में बीज आ गये हो तो इस पौधे से खाद नही बनाना चाहियें बल्कि इस पौधे को उखाड़कर बायोगैस संयत्र में ड़ाल देना चाहियें. इस प्रकार की विधि से पर्याप्त मात्रा में बायोगैस मिलती हैं।

एक अन्य विधि गेंदा और चकोडा से इसको विस्थापित करने से सम्बंधित हैं यदि गेंदा और चकोडा के बीजों को बरसात से पूर्व जहाँ गाजरघास होती हैं वहाँ छिड़क दिया जाये तो ये दोनों पौधें बहुत तेजी से बढ़कर गाजरघास को विस्थापित कर देते हैं ।

●जैविक खेती बिना किसानों की आय दोगनी नहीं होगी


बीटल कीट


सन 1989 में मेक्सिको से एक कीट भारत सरकार ने आयात किया था । जिसका नाम बीटल कीट हैं । एक वयस्क बीटल कीट 1 से डेढ़ माह में गाजरघास के एक पौधे को खा जाता हैं । इस कीट की एक महत्वपूर्ण विशेषता हैं की यह सिर्फ गाजरघास को ही खाता हैं । दूसरी फसलों को इससे कोई नुकसान नहीं होता हैं ।


गाजर घास के प्रकोप से बचने हेतू सावधानियाँ 

• गाजर घास को नंगे हाथों से नही उखाड़ना चाहियें.

• बच्चों द्धारा गाजर घास वाली जगह पर खेलने पर गाजर घास का स्पर्श शरीर पर न हो ऐसी सावधानी रखनी चाहियें.

• घरो के आसपास गाजर घास होनें पर इसका उचित निस्तारण अवश्य करना चाहियें.

• इस पौधे को घर पर किसी भी रूप में नही लाना चाहियें.


• गुडमार के औषधीय गुण और खेती की जानकारी

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

गेरू के औषधीय प्रयोग

गेरू के औषधीय प्रयोग गेरू के औषधीय प्रयोग   आयुर्वेद चिकित्सा में कुछ औषधीयाँ सामान्य जन के मन में  इतना आश्चर्य पैदा करती हैं कि कई लोग इन्हें तब तक औषधी नही मानतें जब तक की इनके विशिष्ट प्रभाव को महसूस नही कर लें । गेरु भी उसी श्रेणी की   आयुर्वेदिक औषधी   हैं। जो सामान्य मिट्टी   से   कहीं अधिक   इसके   विशिष्ट गुणों के लिए जानी जाती हैं। गेरु लाल रंग की मिट्टी होती हैं। जो सम्पूर्ण भारत में बहुतायत मात्रा में मिलती हैं। इसे गेरु या सेनागेरु कहते हैं। गेरू  आयुर्वेद की विशिष्ट औषधि हैं जिसका प्रयोग रोग निदान में बहुतायत किया जाता हैं । गेरू का संस्कृत नाम  गेरू को संस्कृत में गेरिक ,स्वर्णगेरिक तथा पाषाण गेरिक के नाम से जाना जाता हैं । गेरू का लेटिन नाम  गेरू   silicate of aluminia  के नाम से जानी जाती हैं । गेरू की आयुर्वेद मतानुसार प्रकृति गेरू स्निग्ध ,मधुर कसैला ,और शीतल होता हैं । गेरू के औषधीय प्रयोग 1. आंतरिक रक्तस्त्राव रोकनें में गेरू शरीर के किसी भी हिस्से में होनें वाले रक्तस्त्राव को कम करने वाली सर्वमान्य औषधी हैं । इसके ल

PATANJALI BPGRIT VS DIVYA MUKTA VATI EXTRA POWER

PATANJALI BPGRIT VS DIVYA MUKTA VATI EXTRA POWER  पतंजलि आयुर्वेद ने high blood pressure की नई गोली BPGRIT निकाली हैं। इसके पहले पतंजलि आयुर्वेद ने उच्च रक्तचाप के लिए Divya Mukta Vati निकाली थी। अब सवाल उठता हैं कि पतंजलि आयुर्वेद को मुक्ता वटी के अलावा बीपी ग्रिट निकालने की क्या आवश्यकता बढ़ी। तो आईए जानतें हैं BPGRIT VS DIVYA MUKTA VATI EXTRA POWER के बारें में कुछ महत्वपूर्ण बातें BPGRIT INGREDIENTS 1.अर्जुन छाल चूर्ण ( Terminalia Arjuna ) 150 मिलीग्राम 2.अनारदाना ( Punica granatum ) 100 मिलीग्राम 3.गोखरु ( Tribulus Terrestris  ) 100 मिलीग्राम 4.लहसुन ( Allium sativam ) 100  मिलीग्राम 5.दालचीनी (Cinnamon zeylanicun) 50 मिलीग्राम 6.शुद्ध  गुग्गुल ( Commiphora mukul )  7.गोंद रेजिन 10 मिलीग्राम 8.बबूल‌ गोंद 8 मिलीग्राम 9.टेल्कम (Hydrated Magnesium silicate) 8 मिलीग्राम 10. Microcrystlline cellulose 16 मिलीग्राम 11. Sodium carboxmethyle cellulose 8 मिलीग्राम DIVYA MUKTA VATI EXTRA POWER INGREDIENTS 1.गजवा  ( Onosma Bracteatum) 2.ब्राम्ही ( Bacopa monnieri) 3.शंखपुष्पी (Convolvulus pl

होम्योपैथिक बायोकाम्बिनेशन नम्बर #1 से नम्बर #28 तक Homeopathic bio combination in hindi

  1.बायो काम्बिनेशन नम्बर 1 एनिमिया के लिये होम्योपैथिक बायोकाम्बिनेशन नम्बर 1 का उपयोग रक्ताल्पता या एनिमिया को दूर करनें के लियें किया जाता हैं । रक्ताल्पता या एनिमिया शरीर की एक ऐसी अवस्था हैं जिसमें रक्त में हिमोग्लोबिन की सघनता कम हो जाती हैं । हिमोग्लोबिन की कमी होनें से रक्त में आक्सीजन कम परिवहन हो पाता हैं ।  W.H.O.के अनुसार यदि पुरूष में 13 gm/100 ML ,और स्त्री में 12 gm/100ML से कम हिमोग्लोबिन रक्त में हैं तो इसका मतलब हैं कि व्यक्ति एनिमिक या रक्ताल्पता से ग्रसित हैं । एनिमिया के लक्षण ::: 1.शरीर में थकान 2.काम करतें समय साँस लेनें में परेशानी होना 3.चक्कर  आना  4.सिरदर्द 5. हाथों की हथेली और चेहरा पीला होना 6.ह्रदय की असामान्य धड़कन 7.ankle पर सूजन आना 8. अधिक उम्र के लोगों में ह्रदय शूल होना 9.किसी चोंट या बीमारी के कारण शरीर से अधिक रक्त निकलना बायोकाम्बिनेशन नम्बर  1 के मुख्य घटक ० केल्केरिया फास्फोरिका 3x ० फेंरम फास्फोरिकम 3x ० नेट्रम म्यूरिटिकम 6x